Wednesday, May 18, 2022

यूपी में अब किसी नए मदरसों को नहीं मिलेगा सरकारी अनुदान, योगी सरकार ने लिया बड़ा फैसला


इस समय यूपी में 560 मदरसों को अनुदान मिल रहा है.

इस समय यूपी में 560 मदरसों को अनुदान मिल रहा है.

 उत्तर प्रदेश सरकार अब राज्य में किसी भी नए मदरसे को अनुदान नहीं देगी. योगी कैबिनेट की मंगलवार को हुई बैठक में पूर्व की अखिलेश सरकार के फैसले को पलटते हुए नए मदरसों को अनुदान सूची पर लिए जाने की नीति को समाप्त करने का फैसला लिया है.

बता दें कि अखिलेश यादव की सरकार ने अनुदान सूची में शामिल 146 में से सौ मदरसों को शामिल कर लिया था. इसके बाद इन मदरसों का अनुदान भी शुरू कर दिया गया था, जबकि बाकी 46 मदरसों का प्रकरण अभी चल रहा था. इसे लेकर अल्पसंख्यक कल्याण एवं वक्फ मंत्री धर्मपाल सिंह ने बताया कि ये मदरसे मानक ही पूरा नहीं कर रहे थे. अब कैबिनेट में इस नीति को ही समाप्त कर दिया गया है तो किसी भी नए मदरसे को अनुदान की सूची में शामिल नहीं किया जाएगा.

धर्मपाल सिंह ने कैबिनेट मीटिंग के बाद पत्रकारों को बताया, ‘अरबी-फारसी मदरसों में से वर्ष 2003 तक के आलिया (10वीं) स्तर के स्थायी मान्यता प्राप्त मदरसों को अनुदान सूची पर लिए जाने संबंधी नीति को समाप्त किए जाने का प्रस्ताव कैबिनेट में रखा गया था. इस प्रस्ताव के अनुमोदित होने के बाद अब किसी भी नए मदरसे को अनुदान सूची पर नहीं लिया जाएगा.’

गौरतलब है कि इस समय यूपी में 560 मदरसों को अनुदान मिल रहा है. इसके तहत शिक्षकों, गैर शिक्षण कर्मचारियों का वेतन और भत्ता शामिल है.

यूक्रेन, गेहूं बैन, और अब अफगानिस्तान पर भी बदले सुर, अचानक भारत की इतनी तरफदारी क्यों कर रहा चीन?


किसी भी वैश्विक मंच पर या वैश्विक मुद्दे पर चीन भारत के पक्ष में नजर आए, ऐसा कम ही देखने को मिलता है। लेकिन, अगर चीन बार बार भारत का पक्ष लेने लगे, भारत की नीतियों की तारीफ करने लगे, भारत की शान में कसीदे पढ़ने लगे, तो आश्चर्य होने के साथ साथ शक भी होने लगता है, कि आखिर ये चीन की कम्युनिस्ट पार्टी को हो गया है। यूक्नेन युद्ध पर भारत की तारीफ करने के बाद चीन ने भारत के गेहूं निर्यात पर प्रतिबंध लगाने के फैसले की भी तारीफ की है और अब अफगानिस्तान के मुद्दे पर भी चीन भारत की तरफदारी कर रहा है।
  • अफगानिस्तान पर बोला चीन

    अफगानिस्तान पर बोला चीन

    भारत में इस वक्त शंघाई सहयोग संगठन के सदस्य देशों के द्वारा एससीओ शिखर सम्मेलन का आयोजन किया जा रहा है, जिसमें भारत और चीन के अलावा पाकिस्तान और अफगानिस्तान के तमाम पड़ोसी देश भाग ले रहे हैं। एससीओ शिखर सम्मेलन को लेकर चीन ने कहा है कि, नई दिल्ली में आयोजित इस बैठक को चीनी विशेषज्ञों ने एशिया में शांति और सुरक्षा की दिशा में उठाए गये बड़े कदम के संकेत के तौर पर मान रहे हैं। चीन की सरकारी मीडिया ग्लोबल टाइम्स ने कहा है कि, नाटो के विस्तार की वजह से एशिया और यूरोप एक टकराव की स्थिति में फंस गया है। ग्लोबल टाइम्स ने लिखा है कि, मध्य एशिया में भारत, चीन, पाकिस्तान और अन्य एससीओ सदस्यों के प्रतिनिधिमंडल सोमवार को विभिन्न क्षेत्रीय सुरक्षा चुनौतियों, विशेष रूप से अफगानिस्तान में सुरक्षा स्थिति से निपटने में सहयोग बढ़ाने के लिए एकत्र हुए हैं और ग्लोबल टाइम्स ने लिखा है कि, एससीओ शिखर सम्मेलन का आयोजन कर भारत अफगानिस्तान के मुद्दे पर अपनी उपस्थिति बढ़ा रहा है, जो एशिया में शांति की दिशा में बढ़ने का एक संकेत है।

  • अफगानिस्तान पर भारत की तारीफ

    अफगानिस्तान पर भारत की तारीफ

    चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के मुखपत्र ग्लोबल टाइम्स ने सिंघुआ विश्वविद्यालय में राष्ट्रीय रणनीति संस्थान में अनुसंधान विभाग के निदेशक कियान फेंग के हवाले से लिखा है कि, मंगलवार को ग्लोबल टाइम्स को बताया कि बैठक में आतंकवाद, अलगाववाद और धार्मिक कट्टरता को रोकने में एससीओ की भूमिका पर प्रकाश डाला गया। 2001 में स्थापित, एससीओ क्षेत्रीय आतंकवादी खतरों से निपटने और राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक सहयोग को बढ़ावा देने के लिए चीन द्वारा शुरू किया गया पहला क्षेत्रीय संगठन है। कियान ने कहा कि बैठक से पता चलता है कि अफगानिस्तान में सुरक्षा स्थिति को बिगड़ने से फैलने से रोकने और हिंसक आतंकवादी ताकतों को रोकने के लिए सभी क्षेत्रीय देशों में एक साथ काम करने के लिए एक समान हित और आम सहमति है।

  • अफगानिस्तान में कदम पसार रहा भारत- चीन

    अफगानिस्तान में कदम पसार रहा भारत- चीन

    ग्लोबल टाइम्स से बात करते हुए चीन के सुरक्षा विशेषज्ञ ने कहा कि, हालांकि एससीओ की बैठक में तालिबान शामिल नहीं है, क्योंकि भारत कभी भी तलिबान के साथ सहज नहीं रहा है, लेकिन एससीओ सम्मेलन की सक्रिय मेजबानी करके अब ऐसा प्रतीत होता है, कि अफगानिस्तान में भारत अपनी उपस्थिति बढ़ाएगा और अफगानिस्तान की स्थिति पर एक प्रमुख राष्ट्र के तौर पर अपना प्रभाव डालेगा। चीनी विशेषज्ञ ने ये भी कहा कि, रूस और यूक्रेन के बीच संघर्ष के बीच इस बैठक में ज्यादा ध्यान नहीं दिया गया था, क्योंकि यूरोप की स्थिति ने एशियाई देशों को याद दिलाया, कि उन्हें व्यापक सुरक्षा की अवधारणा का पालन करना चाहिए, बातचीत और परामर्श के माध्यम से समस्या का समाधान करना चाहिए, और तब किसी भी असहमति को संघर्ष की तरफ बढ़ने से हम रोक पाएंगे। इस प्रकार भारत में आयोजित की जा रही यह बैठक सुरक्षा के लिए एशिया की खोज का उदाहरण है।

  • भारत के गेहूं प्रतिबंध पर आया साथ

    भारत के गेहूं प्रतिबंध पर आया साथ

    ऐसा पहली बार है, जब चीन ने अफगानिस्तान में भारत की महत्वपूर्ण स्थिति की स्वीकार की है और माना हो, कि अफगानिस्तान में भारत भी एक पक्ष है। इससे पहले चीन ने भारत सरकार के गेहूं निर्यात पर लगाए गये प्रतिबंध को भी सही कदम ठहराया था। ग्रुप ऑफ सेवन (जी 7) देशों की भारत की आलोचना के बाद चीनी राज्य मीडिया ने भारत के गेहूं निर्यात पर प्रतिबंध लगाने के फैसले का बचाव किया था और चीनी सरकार के आउटलेट ग्लोबल टाइम्स ने लिखा था कि, 'भारत को दोष देने से खाद्य समस्या का समाधान नहीं होगा, बल्कि यूरोप को भी विकल्प खोजना चाहिए'। ग्लोबल टाइम्स ने अपने संपादकीय में लिखा है कि, यदि कुछ पश्चिमी देश संभावित वैश्विक खाद्य संकट के मद्देनजर गेहूं के निर्यात को कम करने का खुद भी फैसला लेते हैं, तो वे भारत की आलोचना करने की स्थिति में नहीं होते हैं, क्योंकि इस वक्त भारत भी देश के अंदर अपनी खाद्य आपूर्ति को सुरक्षित करने के दबाव का सामना कर रहा है।

  • भारत की विदेश नीति की तारीफ

    भारत की विदेश नीति की तारीफ

    इससे पहले पिछले महीने ग्लोबल टाइम्स ने भारत की विदेश नीति की भी जमकर तारीफ की थी और कहा था कि, यूक्रेन मुद्दे पर भारत ने अमेरिका के दोमुंहे रवैये को बेनकाब कर दिया है। पिछले महीने 11 अप्रैल को ग्लोबल टाइम्स ने लिखा था कि, भारत के साथ 2+2 बैठक से पहले अमेरिका बार बार इस बात को रेखांकित कर रहा था, कि अमेरिका और भारत 'सामान्य मूल्यों और लचीले लोकतांत्रिक संस्थानों' को साझा करते हैं, और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अपने साझा हितों और प्रतिबद्धताओं की पुष्टि करते हैं। लेकिन, इस बैठक के दौरान दोनों देशों के बीच रूस-यूक्रेन संघर्ष पर ही चर्चा करने में काफी वक्त बिताया गया और नई दिल्ली ने जो रूख दिखाया है, वो साफ जाहिर करता है, कि नई दिल्ली की प्रतिक्रिया स्पष्ट रूप से वाशिंगटन से अलग है।

  • ‘प्रतिबंध में शामिल नहीं भारत’

    ‘प्रतिबंध में शामिल नहीं भारत’

    ग्लोबल टाइम्स ने लिखा था कि, भारत सहित ब्रिक्स देशों ने रूस के खिलाफ प्रतिबंधों में भाग लेने से इनकार कर दिया है। भारत ने रूस के साथ व्यापार को निलंबित तो नहीं ही किया, बल्कि भारत ने रूस से ऊर्जा आयात में वृद्धि ही कर दी है। ग्लोबल टाइम्स ने लिखा था कि, क्वाड का सदस्य देश होते हुए भी भारत मे अमेरिका की नीति का अनुसरण नहीं किय, जिससे अमेरिका को शर्मिंदगी उठानी पड़ी है। इससे यह भी पता चलता है कि वाशिंगटन रणनीतिक महत्वाकांक्षाएं लगातार बढ़ती जा रही हैं, जिसके दायरे में वो देशों को नियंत्रित करना चाहता है, लेकिन अब अमेरिका के पास कुछ ही 'उपग्रह राज्य' हैं। लेकिन, भारत ने अपनी स्वतंत्र विदेश नीति का पालन किया और अमेरिका की बात मानने से इनकार कर दिया और भारत ने ना ही रूस की आलोचना की और ना ही रूस से व्यापार कम किए।

  • बार बार भारत की तरफदारी क्यों?

    बार बार भारत की तरफदारी क्यों?

    पिछले दो महीने में तीन बड़े मुद्दों पर आखिर चीन ने भारत का पक्ष क्यों लिया है, ये एक बड़ा सवाल है। वहीं, चीन के विदेश मंत्री ने भी भारत का दौरा किया था और भारत के साथ संबंधों को फिर से पटरी पर लाने की कोशिश की थी। वहीं, कई विशेषज्ञों का कहना है कि, चीन भारत की बार बार इसलिए तरफदारी कर रहा है, क्योंकि वो इस साल के अंत में चीन में होने वाले ब्रिक्स सम्मेलन को सफल बनाने के लिए भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को बीजिंग बुलाना चाहता है, जिसमें शामिल होने के लिए रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन भी आएंगे और चीन की कोशिश ये है, कि विश्व के तीन शक्तिशाली नेताओं को एक साथ लाकर वो पश्चिम को संदेश दे सके, कि चीन विश्व का सुपरपॉवर बन चुका है या बनने वाला है। हालांकि, इस बात की उम्मीद काफी कम है, कि भारतीय प्रधानमंत्री चीन का दौरा करेंगे।


भारत के गेहूं निर्यात पर बैन से अमेरिका भी परेशान, बोला- भूखी मर जाएगी दुनिया, फैसले पर ‘पुनर्विचार’ करें


भारत ने हाल ही में गेहूं के निर्यात पर बैन लगा दिया था जिसके चलते पूरी दुनिया में गेहूं की कीमतें आसमान छूने लगीं। दुनिया के सबसे अमीर देशों में से एक अमेरिका भी भारत के इस फैसले से परेशान है। हालांकि अमेरिका को उम्मीद है कि भारत गेहूं के निर्यात पर प्रतिबंध लगाने के अपने फैसले पर “पुनर्विचार” करेगा।

अमेरिका ने कहा है कि जिन देशों ने गेहूं के निर्यात पर बैन लगाया है वह उन देशों से अनुरोध करेगा कि ऐसा न करें। दरअसल यूक्रेन पर रूसी अटैक के बाद से पूरी दुनिया में भोजन की कमी देखी जा रही है क्योंकि इससे गेहूं के निर्यात को लेकर सप्लाई चेन बाधित हुई है।

भारत ने क्यों लगाया गेहूं निर्यात पर बैन?

भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा गेहूं उत्पादक देश है। गर्मी और लू की वजह से गेहूं उत्पादन प्रभावित होने की चिंताओं के बीच भारत ने अपने प्रमुख खाद्यान्न की कीमतों में आई भारी तेजी पर अंकुश लगाने के मकसद से गेहूं के निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया है।

इस निर्णय से गेहूं और गेहूं के आटे की खुदरा कीमतों को नियंत्रित करने में मदद मिलेगी, जो पिछले एक साल में औसतन 14-20 प्रतिशत बढ़ी है, इसके अलावा पड़ोसी और कमजोर देशों की खाद्यान्न आवश्यकता को भी पूरा करने में मदद मिलेगी।

भारत से बोला अमेरिका- फैसले पर फिर से सोचें

संयुक्त राष्ट्र में अमेरिकी राजदूत लिंडा थॉमस-ग्रीनफील्ड ने सोमवार को एक वर्चुअल न्यूयॉर्क फॉरेन प्रेस सेंटर ब्रीफिंग के दौरान कहा: “हमने भारत के फैसले की रिपोर्ट देखी है। हम देशों को निर्यात को प्रतिबंधित नहीं करने के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं क्योंकि हमें लगता है कि निर्यात पर कोई भी प्रतिबंध भोजन की कमी को बढ़ा देगा।

उन्होंने कहा कि लोग भुखमरी की कगार पर खड़ें हैं। उन्होंने कहा, “भारत सुरक्षा परिषद में हमारी बैठक में भाग लेने वाले देशों में से एक होगा, और हमें उम्मीद है कि वे अन्य देशों द्वारा उठाई जा रही चिंताओं को सुनेंगे और हम उम्मीद करते हैं कि फिर वे उस स्थिति पर पुनर्विचार करेंगे।”

विकासशील दुनिया के लिए रोटी की टोकरी था यूक्रेन’

थॉमस-ग्रीनफील्ड गेहूं के निर्यात को प्रतिबंधित करने के भारत के निर्णय पर एक सवाल का जवाब दे रही थीं। अमेरिकी दूत ने कहा कि यूक्रेन विकासशील दुनिया के लिए एक रोटी की टोकरी हुआ करता था, लेकिन जब से रूस ने महत्वपूर्ण बंदरगाहों को ब्लॉक करना शुरू किया और नागरिक बुनियादी ढांचे और अनाज सिलोस को नष्ट करना शुरू कर दिया

तब से अफ्रीका और मध्य पूर्व में भूख की स्थिति और भी विकट हो गई है उन्होंने कहा, “यह पूरी दुनिया के लिए एक संकट है, और इसलिए यह संयुक्त राष्ट्र का मुद्दा है। हमारी उन लाखों लोगों के प्रति जिम्मेदारी है जो इस बात को लेकर चिंतित हैं कि उन्हें अपना अगला भोजन कहां मिलेगा या वे अपने परिवार का भरण पोषण कैसे करेंगे।

इस सप्ताह हम इसी बारे में चर्चा करेंगे और दुनिया भर में खाद्य असुरक्षा को कम करने के लिए कदम उठाएंगे।” अमेरिका मई महीने के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का अध्यक्ष है और रूस-यूक्रेन युद्ध जैसे अंतरराष्ट्रीय संघर्षों की पृष्ठभूमि के खिलाफ इस सप्ताह खाद्य सुरक्षा पर एक हस्ताक्षर कार्यक्रम की मेजबानी करेगा।

19 मई को, विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन ‘अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा के रखरखाव: संघर्ष और खाद्य सुरक्षा’ पर एक खुली बहस की अध्यक्षता करेंगे। सुरक्षा परिषद की बैठक की पूर्व संध्या पर, ब्लिंकन बुधवार को एक वैश्विक खाद्य सुरक्षा कॉल टू एक्शन मंत्रिस्तरीय बैठक की अध्यक्षता करेंगे।

विदेश एवं संसदीय मामलों के राज्य मंत्री वी मुरलीधरन 17 मई से 20 मई तक न्यूयॉर्क में रहेंगे। वे संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में ‘वैश्विक खाद्य सुरक्षा – कॉल टू एक्शन’ पर उच्च स्तरीय मंत्रिस्तरीय बैठक में भाग लेंगे और एक बयान देंगे।


Monday, May 16, 2022

ज्ञानवापी मस्जिद में मिले भोलेनाथ, कोर्ट ने परिसर को सील करने का दिया आदेश:प्रताप मिश्रा


ज्ञानवापी श्रृंगार गौरी मामले में बड़ी खबर सामने आई है। सर्वे टीम को परिसर के अंदर शिवलिंग मिला है। यह बात सामने आने के बाद कोर्ट ने डीएम को आदेश दिया कि जिस जगह शिवलिंग मिला है, उसे तत्काल सील कर दें। कोर्ट ने सभी का शिवलिंग क्षेत्र में प्रवेश वर्जित किया था। दोपहर 12 बजे तक शेष 20 फीसदी बचे कार्यो की वीडियोग्राफी और फोटो ग्राफी होनी है। अधिवक्ता कमिश्नर के साथ वादी-प्रतिवादी पक्ष के कुल 52 सदस्यों की मौजूदगी में परिसर में सर्वे हो रहा है। दोपहर 12 बजे तक शेष 20 फीसदी बचे कार्यो की वीडियोग्राफी और फोटो ग्राफी होनी है। माना जा रहा है कि सर्वे टीम और उच्चाधिकारी आपस में विमर्श के बाद परिसर में मौजूद तालाब का पानी निकालकर उसकी भी वीडियोग्राफी करा सकते है। इसके बाद वीडियोग्राफी की चिप कोर्ट कमिश्नर को सौंप दी जाएगी।

मंगलवार 17 मई को कमीशन की कार्यवाही की रिपोर्ट कोर्ट कमिश्नर को न्यायालय में दाखिल करना है। इसके पहले रविवार को मस्जिद व गुंबद के बाद तहखाने के भी कुछ हिस्सों की फोटो और वीडियोग्राफी हुई थी। इसमें गुंबद के हिस्से में अलग बनावट नजर आई। चर्चा है कि मस्जिद परिसर के गुंबदों की बनावट जैसी बाहर से नजर आती है भीतर से काफी अलग है। इसके पहले सर्वे टीम चौक थाने से कड़ी सुरक्षा के बीच ज्ञानवापी मस्जिद के लिए रवाना हुई। मस्जिद परिसर में प्रवेश के पूर्व सभी सदस्यों के मोबाइल फोन जमा करा लिया गया। सर्वे के चलते लगातार तीसरे दिन ज्ञानवापी मस्जिद से लगभग एक किलोमीटर की दूरी तक मार्ग प्रतिबंधित है। काशी विश्वनाथ मंदिर के गेट नंबर चार के दोनों तरफ करीब 500 मीटर पहले ही बैरिकेडिंग लगी हुई है। किसी भी वाहन को गोदौलिया-मैदागिन मार्ग पर नहीं जाने दिया जा रहा है। काशी विश्वनाथ मंदिर में आने वाले दर्शनार्थियों को गलियों के रास्ते काशी विश्वनाथ मंदिर में प्रवेश कराया जा रहा है। ज्ञानवापी के एक किलोमीटर तक जगह-जगह पुलिस और पीएसी के जवान मुस्तैद है। पुलिस अफसरों के अनुसार ज्ञानवापी की सुरक्षा बढ़ा दी गई है। पहले दिन सुरक्षा 10 लेयर की थी । दूसरे दिन रविवार को 12 लेयर की कर दी गई। तीसरे और अन्तिम दिन 16 लेयर की सुरक्षा व्यवस्था की गई है।

वाराणसी पुलिस कमिश्नर ए सतीश गणेश ने मीडिया कर्मियों को बताया कि न्यायालय के आदेश पर कोर्ट कमिश्नर की मौजूदगी में ज्ञानवापी मस्जिद का सर्वे हो रहा है। आज बुध पूर्णिमा पर काशी विश्वनाथ मंदिर में भक्तों की भारी भीड़ को देख सुरक्षा की पर्याप्त व्यवस्था की गई है। उन्होंने बताया कि पूरे शहर को सुरक्षा कारणों से सेक्टर और जोन में बांटा गया है। शहर के लिए हमने राजपत्रित अधिकारी की ड्यूटी लगाई है, और जोन के लिए पुलिस अधीक्षक को जिम्मेदारी सौंपी गई है।

न्यायालय से नियुक्त विशेष अधिवक्ता कमिश्नर विशाल सिंह ने बताया कि, कमीशन की कार्यवाही का आज आखिरी दिन है। सर्वे आज पूरा हो जाएगा। सर्वे अपने नियत समय सुबह 8 से दोपहर 12 बजे तक होगा। सर्वे में क्या क्या जांच हुई, ये सारी बातें गोपनीय हैं। कोर्ट के आदेशानुसार जिला प्रशासन ने पूरा सहयोग किया है। फ्लड लाइट, सफाईकर्मी, ड्राफ्ट मैन जितनी भी सहायता मांगी गई। जिलाधिकारी ने सभी कुछ उपलब्ध कराया। आज जितने भी कार्य सर्वे के दौरान बचे हैं। सभी पूरे हो जाएंगे और 17 मई को कोर्ट में इसकी रिपोर्ट प्रस्तुत की जाएगी। उधर, ज्ञानवापी विवाद मामले में आज सोमवार को ही इलाहाबाद हाईकोर्ट में भी सुनवाई है। एक विवाद से जुड़ी 3-3 याचिकाएं दाखिल हैं। कुल 6 याचिकाओं पर सुनवाई होनी है।

बाबा विश्वनाथ के दरबार में उमड़े श्रद्धालु -

सोमवार का दिन और बुद्ध पूर्णिमा पर्व के चलते श्री काशी विश्वनाथ के स्वर्णिम दरबार में दर्शन पूजन और जलाभिषेक के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ी है। बुद्ध पूर्णिमा पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु गंगा स्नान के बाद दरबार में पहुंच रहे है। उनकी सुरक्षा के लिए गंगा में एनडीआरएफ और जल पुलिस तैनात हैं। मंदिर में आने वाले श्रद्धालुओं को गेट नंबर एक और गंगा द्वार से मंदिर में प्रवेश कराया जा रहा है। पर्व पर दरबार में दर्शन पूजन के लिए श्रद्धालुओं की लंबी कतार लगी है। ज्ञानवापी मस्जिद में सर्वे के चलते सुरक्षा कारणों से मंदिर का गेट नंबर चार बंद है।

Sunday, May 15, 2022

काले हिरण और मोर के शिकारियाें काे काेर्ट ले जाते समय गाड़ी पलटी, आराेपित भागे ताे पैराें में मारी गाेली, गिरफ्तार


Attack on Guna Police: शिकारियाें काे काेर्ट ले जाते समय  गाड़ी पलटी, आराेपित भागे ताे पैराें में मारी गाेली, गिरफ्तार
शार्ट एनकाउंटर के दाैरान दाेनाें आराेपिताें के पैराें में गाेलियां लगी हैं। इसके बाद दाेनाें आराेपिताें काे पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है।

गुना के आराेन में पुलिस जवानाें काे गाेली मारने के मामले में गिरफ्तार दाे आराेपिताें काे पुलिस आज काेर्ट लेकर जा रही थी। इसी दाैरान अचानक गाड़ी अनियंत्रित हाेकर पलट गई। माैके का फायदा उठाकर जब आराेपिताें ने भागने का प्रयास किया ताे पुलिस काे गाेलियां चलाना पड़ी। शार्ट एनकाउंटर के दाैरान दाेनाें आराेपिताें के पैराें में गाेलियां लगी हैं। इसके बाद दाेनाें आराेपिताें काे पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है।

पुलिस ने इस मामले में 8 शिकारियाें काे हिरासत में लिया था, जबकि दाे की एनकाउंटर के दाैरान माैत हाे चुकी है। पुलिस आज शिकारी जिया खान और शानू खान काे काेर्ट में पेश करने के लिए लेकर जा रही थी। इसी दाैरान माेड़ पर पुलिस वाहन अनियंत्रित हाेकर सड़क पर पलट गया। पुलिसकर्मी खुद काे संभालने की काेशिश में जुटे हुए थे कि तभी दाेनाें आराेपिताें ने माैके का फायदा उठाकर भागने का प्रयास किया। पुलिस ने चेतावनी दी लेकिन शिकारियाें ने रूकने की जगह दाैड़ लगाना शुरू कर दिया। ऐसे में पुलिस काे गाेलियां चलाना पड़ी, जिसमें दाेनाें के पैराें में गाेलियां लगी हैं। इसके बाद दाेनाें काे गिरफ्तार करके अस्पताल ले जाया गया है।

दाे की एनकाउंटर में माैतः मध्य प्रदेश के गुना के आरोन थानाक्षेत्र में शुक्रवार-शनिवार की दरमियानी रात पुलिस और शिकारियों के बीच मुठभेड़ में एक एसआइ सहित तीन पुलिसकर्मियों की मौत हो गई। रात में मुठभेड़ में एक शिकारी नौशाद मारा गया था, वहीं दूसरे शिकारी शहजाद को भी पुलिस ने मुठभेड़ में मार गिराया। गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा ने बताया कि दूसरा आरोपित कहीं पहाड़ के पास छिपा था, उसने आठ राउंड गोली पुलिस पर चलाई, जवाबी कार्रवाई में मारा गया। मुख्य आरोपित अभी फरार है, जिसकी तलाश की जा रही है।

क्या है घटनाक्रमः शुक्रवार की रात करीब 12.30 बजे आरोन थाना पुलिस को सूचना मिली थी कि शहरोक गांव की पुलिया से आगे मौनवाड़ा के जंगल में शिकारियों द्वारा ब्लैक बग हिरण और मोर का शिकार किया गया है। इस पर थाने से एसआइ राजकुमार जाटव, प्रधान आरक्षक नीरज भार्गव और आरक्षक संतराम मीना सहित सात लोग दो चारपहिया और एक बाइक से जंगल की ओर रवाना हुए। इस दौरान पुलिस ने चार मोटरसाइकिल से आए दो-तीन शिकारियों को पकड़ लिया, लेकिन तभी पीछे से आए शिकारियों के अन्य साथियों ने फायरिंग शुरू कर दी। इसमें तीन पुलिसकर्मियों की गाेलियां लगने से मौके पर मौत हो गई।

Friday, May 13, 2022

श्रीलंका के नए प्रधानमंत्री बने रानिल विक्रमसिंघे


सबसे भीषण आर्थिक संकट का सामना कर रहे श्रीलंका में रानिल विक्रमसिंघे नए प्रधानमंत्री बने हैं। पीएम बनें रानिल विक्रमासिंघे ने वादा किया है कि वह देश की संकटग्रस्त अर्थव्यवस्था को ऊपर उठाने की पूरी कोशिश करेंगे। इसी के साथ गुरुवार को श्रीलंका के नए प्रधान मंत्री के रूप में शपथ लेने के बाद रानिल विक्रमसिंघे ने अपनी पहली टिप्पणी में कहा कि भारत के साथ द्वीप राष्ट्र के संबंध पिछली सरकार की तुलना में ‘बहुत बेहतर’ होंगे। विक्रमसिंघे ने यह भी कहा कि उन्होंने अर्थव्यवस्था के उत्थान की चुनौती ली है और इसे पूरा करेंगे।

रानिल विक्रमसिंघे ने कहा, “मैंने अर्थव्यवस्था को ऊपर उठाने की चुनौती स्वीकार की है और मुझे इसे पूरा करना होगा।” भारत-श्रीलंका संबंधों के बारे में पीएम ने कहा, “यह बहुत बेहतर हो जाएंगे।” देश की सड़कों पर प्रदर्शन कर रहे लोगों के बारे में पीएम ने कहा, “उन्हें ठहरना चाहिए, हम चाहते हैं कि वे थम जाएं, अगर वे बात करना चाहते हैं तो हम तैयार है।”

बंद कमरे में प्रधान मंत्री की हुई नियुक्ति

बता दें, 73 वर्षीय यूनाइटेड नेशनल पार्टी (यूएनपी) के नेता को राष्ट्रपति गोटबाया राजपक्षे ने बुधवार को बंद कमरे में चर्चा के बाद प्रधान मंत्री के रूप में नियुक्त किया। श्रीलंका के चार बार प्रधानमंत्री रह चुके विक्रमसिंघे को अक्टूबर 2018 में तत्कालीन राष्ट्रपति मैत्रीपाला सिरीसेना ने प्रधानमंत्री पद से हटा दिया था। हालांकि दो महीने बाद ही सिरीसेना ने उन्हें इस पद पर बहाल कर दिया था।

70 के दशक में रानिल ने राजनीति में कदम रखा और पहली बार 1977 में सांसद चुने गए थे। 1993 में पहली बार PM बनने से पहले रानिल उप विदेश मंत्री, युवा और रोजगार मंत्री सहित कई और मंत्रालय संभाल चुके हैं। वह संसद में दो बार विपक्षी नेता की भूमिका निभा चुके हैं। बता दें, रानिल विक्रमसिंघे को भारत समर्थक माना जाता है। वह भारत के साथ संबंध प्रगाढ़ करने के प्रबल हिमायती रहे हैं। पड़ोसी देश भारत के प्रति किसी तरह का पूर्वग्रह नहीं रखते।

स्टॉक एक्सचेंज में तीन प्रतिशत का उछाल

आपको बता दें, 1948 में ब्रिटेन से आजादी के बाद से श्रीलंका अपने सबसे खराब आर्थिक संकट का सामना कर रहा है। मगर आर्थिक संकट से जूझ रहे श्रीलंका को नया प्रधानमंत्री मिलने के साथ आर्थिक सुधार के संकेत मिले हैं। यहां स्टॉक एक्सचेंज में तीन प्रतिशत का उछाल आया है।

मन्दिरों पर से मुस्लिम आक्रांताओं का अवैध कब्जा स्वतः ही छोड़ दें भारतीय मुसलमान: प्रताप मिश्रा

भारत के सन्दर्भ में यह समझना बहुत जरूरी है कि इस देश की मूल भारतीय या हिन्दू संस्कृति का केन्द्र मानवतावाद ही रहा है जिसकी वजह से इस धरती पर आने वाले प्रत्येक धर्म के अनुयायी का स्वागत हुआ और उसे अपने मजहब की पूजा पद्धति मानने का कहीं कोई विरोध नहीं हुआ। इसकी प्रमुख वजह यह थी कि स्वयं हिन्दू धर्म में ही किसी एक वि​धि द्वारा पूजा-अर्चना के अनुष्ठान किये जाने की रूढ परंपरा नहीं थी। बदलते समय के अनुसार इन परंपराओं में वृद्धि होती रही और नये–नये मतों की उत्पत्ति होती रही जिनके आधार पर पंथों का गठन होता रहा किन्तु इनके मानने वालों में कभी कोई वैमनस्य पैदा नहीं हुआ और ये सब अपने-अपने तरीके से अपनी परंपराओं का निर्वाह करते रहे जिसके परिणामस्वरूप भारत के समाज में सहिष्णुता और सहनशीलता का भाव अन्तर्निहित हो गया परन्तु इसे केवल सहनशीलता या सहिष्णुता के दायरे में कैद कर देना भी हिन्दू संस्कृति के प्रति न्याय नहीं होगा बल्कि यह इससे भी ऊपर मानव की अपनी स्वतन्त्र व सम्मान की सत्ता थी जिसे ‘मानवतावाद’  ही कहा जाना चाहिए परन्तु इसके विरोध में वामपंथी या प्रगतिशील कहे जाने वाले विचारक यह तर्क देते हैं कि यदि सांस्कृतिक भाव इतना उदार था तो इसमें वर्ण व्यवस्था के चलते शूद्र समाज के लोगों के साथ पशुवत व्यवहार क्यों किया जाता था और उसमें ‘अंत्यज’  जैसी श्रेणी किस प्रकार अस्तित्व में आ गई थी। यजुर्वेद में वर्ण व्यवस्था का जिक्र मिलता है परन्तु यह जन्म से न होकर कर्म से परिभाषित थी। अतः यह तर्कपूर्ण है कि जैसे–जैसे समाज का आर्थिक विकास होता गया और इसमें समाज के विशेष वर्गों के आर्थिक हित उन्हें प्राप्त होने वाली सम्पत्ति से पोषित होने लगे वैसे- वैसे ही वर्ण व्यवस्था की जड़े जमती गईं और इसने जन्म मूलक रूप धारण कर लिया और यहां तक हुआ कि शूद्रों के देवता भी प्रथक कर दिये गये। अतः हिन्दू समाज में असहनशीलता का भाव हमें सबसे पहले शूद्रों के प्रति उपजी निर्दयता में मिलता है और उनके सामाजिक व आर्थिक शोषण में मिलता है परन्तु हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि इसका विरोध भी हिन्दू संस्कृति में ही हुआ और ‘आजीविका’ मत का उदय हुआ जिसका मूल सिद्धान्त नियति या कर्म पर आधारित था। यह मत अनीश्वरवादी था और मानता था कि मनुष्य नियति के लेख के अनुसार ही कर्म करता है अतः अच्छा या बुरा कर्म कुछ नहीं होता है। संभवतः ‘अऱाजक’ शब्द की उत्पत्ति भी यहीं से हुई है। इसके साथ ही ईसा से साढे़ छह सौ वर्ष पूर्व ही बौद्ध धर्म की उत्पत्ति हुई जिसमें सद्कर्मों की ‘अष्टपदि’ नियमावली के अनुसार मनुष्य काे निर्वाण प्राप्ति का रास्ता दिखाया गया। इसके साथ ही इससे चालीस साल पहले जैन धर्म के तीर्थांकर महावीर स्वामी ने भी प्रेम, अहिंसा व सत्य के मार्ग से मोक्ष की प्राप्ति का रास्ता बताया परन्तु इन सभी पंथों की ग्राह्यता हिन्दू संस्कृति में बिना किसी राग- द्वेष के हो गई और यहां तक हो गई कि बुद्द को भगवान विष्णु का अवतार भी स्वीकार कर लिया गया जो बौद्ध धर्म की ‘महायान’ शाखा के बाद संपुष्ट हुआ। इन सभी धर्मों के प्रतीक स्थल भारत में एक-दूसरे के समानान्तर खड़े रहे और भारत की विविधता में समा गये, बेशक इक्के–दुक्के मामलों में बौद्ध व सनातन धर्म के प्रतीक स्थलों के मामले में संघर्ष का जिक्र जरूर मिलता है परन्तु अन्ततः बुद्ध भागवान विष्णु के अवतार के रूप में ही प्रतिष्ठापित हुए। परन्तु 711 के बाद सिन्ध के रास्ते भारत में इस्लाम के प्रवेश के साथ हमें यह आपसी सद्भाव टूटता हुआ मिला है क्योंकि सिन्ध में आने वाले मोहम्मद बिन कासिम ने वहां के हिन्दू राजा दाहिर को हराने के बाद इस्लाम को तलवार और ताकत के जोर पर फैलाना शुरू किया औऱ हिन्दू व बौद्ध नागरिकों का कत्लेआम करने के साथ उनकी औरतों को गुलाम बना कर ‘दमिश्क’ में बेचा और गैर मुस्लिम प्रजा से ‘जजिया’ वसूलने की कुप्रथा शुरू की। यह इस्लाम के फैलने का दौर था और इसी दौरान 712 में स्पेन में भी इस्लाम का प्रवेश हुआ जो सात सौ सालों तक काबिज रहा। स्पेन का इस्लामीकरण भी इस दौरान जम कर किया गया और तमाम चर्चों को मस्जिदों में बदल दिया गया परन्तु 15वीं शताब्दी के अन्त में जब यहां इस्लामी हुकूमत समाप्त हो गई तो इसके बाद स्पेन ने अपनी पुरानी जड़ों की तरफ लौटना शुरू किया और अपनी चर्चों को वापस लेते हुए पुनः इसाईत का डंका बजाया। आज स्पेन की 95 प्रतिशत से अधिक जनता इसाई धर्म को मानने वाली है। इसकी असली वजह ही थी कि स्पेनी नागरिकों ने कभी भी अपनी मूल संस्कृति से किनाराकशी नहीं की और स्वयं को सबसे पहले स्पेनिश समझा परन्तु भारत में महमूद गजनबी से लेकर मोहम्मद गौरी और बाद के मुस्लिम आक्रान्ताओं ने यहां के नागरिकों का धर्मान्तरण करके उसकी जड़ें मुल्ला–मौलवियों की मदद से भारत से काटने की मुहीम चलाई और उन्हें सबसे पहले ‘मुसलमान’ पहचान देने की कोशिश की जबकि इसके समानान्तर इंडोनेशिया व मलेशिया जैसे देशों में यह नहीं हो सका क्योंकि यहां के नागरिकों ने अपनी पहली राष्ट्रीय पहचान मलय या इंडोनेशियाई को नहीं छोड़ा जिसकी वजह से इन देशों के नागरिकों के नाम आज भी आधे हिन्दू और आधे मुस्लिम होते हैं परन्तु भारत में यह लगातार आठ सौ वर्षओं के लगभग इस्लाम शासन रहने की वजह से नहीं हो सका क्योंकि भारत के मुगल सम्राट तक अरब के मक्का तीर्थ स्थल का पूरा खर्चा उठाते थे। केवल अकबर के शासन को छोड़ कर शेष किसी भी मुगल शासक जमाने में हिन्दुओं पर अत्याचार नहीं रुके जिसकी वजह उनके दरबार में मौजूद कट्टर मुल्ला और काजियों का होना था। हिन्दू मन्दिरों का विध्वंस जिसे ‘बुत शिकनी’ कहा जाता था उसे ये मुल्ला या काजी इस्लाम के अनुसार जायज ठहराते थे। बेशक शासन की मजबूरियों के चलते और अर्थव्यवस्था के मुख्य स्रोत हिन्दुओं के हाथ में ही होने की वजह से इनमें कभी कुछ रियायत भी दे दी जाती थी मगर बादशाह मौलवियों की सलाह पर ही चलता था। जरा अक्ल से सोचने वाली बात है कि कुतुबमीनार बनाने वाला कुतबुदीन एबक अपने साथ न तो कोई कारीगर लाया था और न मिस्त्री तथा पत्थरों पर नक्काशी करने वाले लोग उसने पहले से ही मौजूद हिन्दू व जैन मन्दिरों को तोड़ कर इस्लामी इमारतें तामीर कराई थीं। मन्दिरों की भव्यता और उनकी उत्कृष्ठ स्थापत्यकला व नक्काशी से मुस्लिम आक्रन्ता इतने भयभीत रहते थे कि उहें विध्वंस करके उन्हीं के मलबे से नई इमारतें बना डालते थे। अतः वाराणसी में जिस ज्ञानव्यापी मस्जिद का मामला न्यायालय में चल रहा है वह पूरी तरह हिन्दू मन्दिर के विध्वंस की ही मिसाल है औऱ इसी तरह मथुरा के श्रीकृष्ण जन्म स्थान किले का मामला है। इतिहास को कोई कैसे बदल सकता है जबकि यह हकीकत है कि अहमद शाह अब्दाली ने मथुरा-वृन्दावन में सैकड़ाें मन्दिरों को तोड़ डाला था। अतः भारत के मुसलमानों का यह फर्ज बनता है कि वह स्वतः ही ऐसे सभी स्थानों को स्वेच्छा से हिन्दुओं को सौंप दें जिनसे हिन्दू धर्म की पहचान जुड़ी हुई है। उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि मुस्लिम आक्रान्ताओं ने ही उनके पूर्वजों पर जुल्म ढहा कर उनकी पहचान बदलने की कोशिश की थी।

परम तत्व दर्शन