Sunday, December 4, 2022

भारत-नेपाल बार्डर पर पथराव के बाद तनाव, काली नदी पर तटबंध निर्माण कर रहे मजदूरों पर की गई पत्थरबाजी


धारचूला में काली नदी के दोनों ओर सैकड़ों गांव बसे हुए हैं। नदी के एक ओर भारतीय क्षेत्र है तो दूसरी ओर नेपाली। इन गांववालों ने आवागमन के लिए कई झूला पुल बना रखे हैं। भारत-नेपाल की सरहद पर एसएसबी की निगरानी है। धारचूला नेपाल और चीन से लगने वाला बार्डर एरिया भी है।

Indo Nepal Border tension near dharchula Uttarakhand, Stone pelting near Kali river, DVG

Indo-Nepal Border: उत्तराखंड के पिथौरागढ़ के पास भारत-नेपाल बॉर्डर पर पड़ोसी देश की ओर से हुए पथराव के बाद स्थितियां तनावपूर्ण हो गई हैं। यह घटना रविवार शाम की है। बताया जा रहा है कि नेपाल की ओर से भारतीय सीमा क्षेत्र में काम कर रहे मजदूरों पर पत्थर फेंके गए। धारचूला क्षेत्र में यह पथराव किया गया। दरअसल, यहां काली नदी पर तटबंध का निर्माण कार्य जोरों पर है। भारतीय क्षेत्र में हो रहे इस निर्माण पर नेपाल में विरोध हो रहा है। 

काली नदी के आसपास हैं सैकड़ों गांव

दरअसल, धारचूला में काली नदी के दोनों ओर सैकड़ों गांव बसे हुए हैं। नदी के एक ओर भारतीय क्षेत्र है तो दूसरी ओर नेपाली। इन गांववालों ने आवागमन के लिए कई झूला पुल बना रखे हैं। भारत-नेपाल की सरहद पर एसएसबी की निगरानी है। धारचूला नेपाल और चीन से लगने वाला बार्डर एरिया भी है। यहां से चीन की सीमा करीब 80 किलोमीटर की दूरी पर है। धारचूला लिपुलेख हाईवे का निर्माण चीन ने किया हुआ है। 

क्यों हो रहा है धारचूला के काली नदी पर विवाद?

भारत-नेपाल के रिश्तों में तल्खी तब आई जब नेपाली सरकार ने कुछ समय पहले अपना नया नक्शा जारी किया। इस राजनीतिक नक्शे में कालापानी, लिंपियाधुरा, लिपुलेख को नेपाल का क्षेत्र दर्शाया गया जबकि भारत के उत्तराखंड का यह हिस्सा है। दो साल पहले भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने उत्तराखंड के धारचूला से चीन सीमा पर लिपुलेख तक एक संपर्क मार्ग का उद्घाटन किया था। इस पर नेपाल ने विरोध करते हुए उस पर अपना दावा जताया था। इस क्षेत्रीय विवाद के बाद दोनों देशों के बीच तनाव थोड़ा बढ़ गया। यही नहीं इस तनाव के बाद नेपाल ने दोनों सीमाओं के नो मेंस लैंड पर भी अवैध कब्जा करने की कोशिश की। जुलाई 2020 में उत्तराखंड के टनकपुर से लगी सीमा पर नेपाल ने नो मेंस लैंड पर अधिकार जमाने की कोशिश की। लेकिन दोनों तरफ से हंगामा के बाद मामला थोड़ा शांत हुआ। इसी तरह बिहार के पूर्वी चंपारण में भी एक बंधा का काम नेपाल सरकार ने अपना दावा करते हुए रोक दिया था।

सात समंदर पार से भारतीयों ने भर दिया भारत का खजाना, साल 2022 में भेजे रिकॉर्ड तोड़ 100 अरब डॉलर: प्रताप मिश्रा


'माय-माटी' को छोड़कर सात समंदर पार दूसरे देशों में रह रहे भारतीयों ने साल 2022 में रिकॉर्ड तोड़ करीब 100 अरब डॉलर भेजे हैं. यह राशि भारतीय शेयर बाजार में कुल प्रत्यक्ष विदेशी निवेश से ज्यादा है. विश्व बैंक की एक रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2022 के दौरान भारत में विदेशों से आने वाले रुपयों में 12 फीसदी तक का इजाफा देखने को मिला है. सबसे बड़ी बात यह है कि विदेश में कमाने वाले भारतीयों ने इतने पैसे भेजे, जो देश के शेयर बाजार में आने वाले विदेशी निवेश (एफडीआई) से करीब 25 फीसदी ज्यादा है. भारत के बाद मेक्सिको, चीन और फिलिपिंस का स्थान है.

विदेश से आने वाले पैसों में बढ़ोतरी की उम्मीद

एक रिपोर्ट के मुताबिक, खाड़ी देशों में इस बार बड़े पैमाने पर अनौपचारिक रोजगार के मौके भी बने. इसी के साथ दुनिया के कई अमीर देशों जैसे सिंगापुर, जापान, आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड में भी खूब नौकरियां आई थीं. विदेशों से भारत भेजी जाने वाली रकम में बीते वर्षों में लगातार इजाफा देखने को मिल रहा है. इसमें आने वाले वर्षों में और बढ़ोतरी होने का अनुमान है.

2021 में भारतीयों ने 87 अरब डॉलर भेजे

विदेशों में रहने वाले भारतीयों ने पिछले साल भारत में करीब 87 अरब डॉलर भेजे थे. इसमें सबसे ज्यादा रकम अमेरिका से भेजी गई थी, जबकि साल 2020 की बात करें तो करीब 83 अरब डॉलर की रकम भेजी गई थी. साल 2016-17 और 2020-21 के बीच यूएस, यूनाइटेड किंगडम और सिंगापुर से रकम भेजने का हिस्सा 26 फीसदी से बढ़कर 36 फीसदी ज्यादा हो गया है. हालांकि, पांच जीसीसी देशों सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कुवैत, ओमान और कतर से भेजी जाने वाली रकम में गिरावट आई है. ये 54 फीसदी से गिरकर 28 फीसदी हो गई है.

भारत में अमेरिका का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश 40 अरब डॉलर के पार

2020-21 में अमेरिका से आया सबसे अधिक धन

रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2020-21 में भारत में विदेशों से जो रकम भेजी गई उसमें अमेरिका सबसे आगे रहा. अमेरिका ने संयुक्त अरब अमीरात को पीछे छोड़ दिया. रिपोर्ट के मुताबिक, इस दौरान कई लोगों ने स्नातक की डिग्री हासिल की, जिसने उन्हें तेजी से सबसे ज्यादा कमाई करने का मौका मिला. इससे लोगों की कमाई बढ़ी और उन्होंने भारत में ज्यादा रुपये भेजे. इस साल यानी 2022 में देश में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में भी बढ़ोतरी की संभावना है. इसके 100 अरब डॉलर के पार जाने की उम्मीद जताई जा रही है. सरकार की ओर से उम्मीद जताई जा रही है कि आर्थिक सुधारों और बिजनस फ्रेंडली एनवायरमेंट की वजह से भारत में विदेशी निवेश 100 अरब के आंकड़े को पार कर लेगा.

तेल की कीमत पर सीमा लगाने से आगबबूला हुआ रूस, कहा- अपनी सुरक्षा को खतरे में डाल रहा यूरोपीय संघ


Russia Ukraine War: तेल की कीमत पर सीमा लगाने से आगबबूला हुआ रूस, कहा- अपनी सुरक्षा को खतरे में डाल रहा यूरोपीय संघ

Russia Ukraine Conflict: आखिरकार लंबी जद्दोजहद के बाद यूरोपीय संघ (EU) और जी-7 ने तेल की कीमतों पर सीमा लगाने वाला प्रस्ताव मंजूर कर ही दिया. इसकी पुष्टि अमेरिका की वित्त मंत्री जैनेट येलेन ने भी ट्वीट करके की. उन्होंने रूस-यूक्रेन युद्ध की तरफ इशारा करते हुए कहा कि इससे रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की आय पर असर पड़ेगा और ‘बर्बर युद्ध को जारी रखने के लिए मिल रहे राजस्व के स्रोत सीमित होंगे.’ वहीं, दूसरी तरफ रूस ने इस फ़ैसले की आलोचना करते हुए कहा है कि ‘इस तरह तेल की क़ीमत पर सीमा लगा कर यूरोपीय संघ अपनी उर्जा सुरक्षा को ख़ुद ख़तरे में डाल रहा है.’

क्या कहा- अमेरिकी वित्त मंत्री ने

अमेरिका की वित्त मंत्री जैनेट येलेन ने कहा कि ‘तेल की कीमतों पर सीमा लगने से कम और मध्यम आय वाले उन मुल्कों को ख़ास फायदा होगा जो तेल और गैस की और अनाज की बढ़ती क़ीमतों की परेशानी झेल रहे हैं.’ इसके अलावा उन्होंने इस फैसले को रूस और यूक्रेन युद्ध से भी जोड़ा. उन्होंने कहा, ‘रूस की इकॉनमी पहले ही काफी बैठ चुकी है. अब तेल की क़ीमतों पर लगी सीमा से उनके राजस्व के स्रोत पर और असर पड़ेगा.’

ऐसे समझें पूरे नियम को

यूरोपीय संघ ने तेल की सीमा तय करते हुए जो नियम बनाए हैं, उसके अनुसार इस संघ में शामिल देश अब समुद्र के रास्ते निर्यात किए जाने वाले रूसी तेल की क़ीमत 60 डॉलर प्रति बैरल से अधिक नहीं देंगे. रूसी तेल की क़ीमतों पर ये सीमा पांच दिसंबर या फिर इसके तुरंत बाद लागू हो जाएगी. यह कोशिश रूस के आय के स्रोत को खत्म करने के लिए की गई है. दरअसल, तमाम आर्थिक पाबंदियों के बावजूद रूस तेल के जरिये अच्छी कमाई कर रहा था. 

रूस ने कहा, इसके गंभीर परिणाम होंगे

वही, रूस ने इस फैसले के बाद मोर्चा खोल दिया है. उसने इसकी आलोचना करने के साथ ही इसके परिणाम भुगतने की भी धमकी दी है. रूस का कहना है कि जो देश तेल की क़ीमत पर लगाई गई सीमा के हिसाब से तेल खरीदना चाहते हैं, उन्हें वह तेल नहीं बेचेगा. रूस ने कहा है कि इस तरह तेल की क़ीमत पर सीमा लगा कर यूरोपीय संघ अपनी उर्जा सुरक्षा को ख़ुद ख़तरे में डाल रहा है. बता दें कि पुतिन पहले भी तेल पर इस तरह की समा लगाने को लेकर कह चुके हैं कि इसके गंभीर परिणाम होंगे.

सख्ती के बाद भी ऐसे बचा रहेगा रूस 

इंटरनेशनल एनर्जी असोसिएशन के अनुसार, युद्ध शुरू होने से पहले, वर्ष 2021 में रूस आधे से ज्यादा तेल निर्यात यूरोप में ही करता था. उसका सबसे बड़ा आयातक क्रमशः जर्मनी, नीदरलैंड्स और पोलैंड था. पर यूक्रेन पर हमले के बाद से यूरोपीय संघ के देश रूस से मिलने वाले तेल और गैस पर निर्भरता कम करने पर लग गए. अमेरिका ने जहां रूसी कच्चे तेल पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया तो ब्रिटेन की साल के अंत तक रूसी तेल पर निर्भरता ख़त्म करने की प्लानिंग है. यह सारी कवायद रूस की इनकम को रोकने की है. पर माना जा रहा है कि इस फैसले का असर रूस पर तब तक नहीं पड़ेगा जब तक भारत और चीन रूस से तेल खरीद रहे हैं. मौजूदा समय में भारत और चीन ही रूसी तेल के सबसे बड़े खरीदार हैं. 

Friday, December 2, 2022

रूस समेत अन्य देशों से तेल खरीदता रहेगा भारत, रूसी तेल पर ईयू की पाबंदी से पहले किया ऐलान


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नई दिल्ली। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए रूस समेत किसी भी देश से तेल खरीदता रहेगा। एक वरिष्ठ अधिकारी ने रूसी तेल पर यूरोपीय संघ की पाबंदी लागू होने से पहले यह बात कही।

यूरोपीय संघ (ईयू) के कार्यकारी निकाय ने 27 सदस्य देशों से रूसी तेल के लिए कीमत सीमा 60 डॉलर प्रति बैरल तय करने को कहा है। पश्चिमी देशों के इस कदम का मकसद वैश्विक कीमतों और आपूर्ति को स्थिर बनाए रखते हुए रूस के तेल राजस्व को कम कर यूक्रेन के साथ युद्ध लड़ने की उसकी क्षमता को प्रभावित करना है।

अधिकारी ने कहा, ईरान और वेनेजुएला के विपरीत रूस से तेल खरीदने पर कोई पाबंदी नहीं है। ऐसे में जो कोई भी पोत परिवहन, बीमा और वित्त पोषण की व्यवस्था कर सकता है, वह तेल खरीद सकता है। उन्होंने कहा, हम रूस सहित दुनिया में कहीं से भी तेल खरीदना जारी रखेंगे।

कीमत सीमा व्यवस्था पांच दिसंबर से लागू होगी। इसके तहत यूरोप के बाहर रूसी तेल का परिवहन करने वाली कंपनियां तभी यूरोपीय संघ की बीमा और ब्रोकरेज सेवाओं का उपयोग कर सकेंगी, जब वे 60 अमेरिकी डॉलर या उससे कम में तेल बेचेंगी।

अधिकारी ने कहा, व्यावहारिक रूप से देखा जाए तो अगर मैं एक जहाज भेज सकता हूं, बीमा कवर कर सकता हूं और भुगतान का एक तरीका तैयार कर सकता हूं, तो रूस से तेल खरीदना जारी रखा जा सकता है। उन्होंने कहा कि सभी विकल्प खुले हैं।

अधिकारी ने कहा, कोई यह नहीं कह रहा कि रूस से तेल नहीं खरीदो। रूस कोई बड़ा आपूर्तिकर्ता नहीं है। भारत 30 देशों से आपूर्ति प्राप्त करता है। हमारे पास तेल खरीदने के कई स्रोत हैं। इसीलिए हमें किसी प्रकार की बाधा की कोई आशंका नहीं है।

खून बहेगा… ब्राह्मणों वापस जाओ, भारत छोड़ो: JNU में वामपंथियों का आतंक, क्लास से लेकर प्रोफेसरों तक को धमकी


JNU एबीवीपी के अध्यक्ष रोहित कुमार ने कहा, "एबीवीपी कम्युनिस्ट गुंडों द्वारा अकादमिक स्थानों में बड़े पैमाने पर जातिसूचक नारे लिखने की निंदा करता है। कम्युनिस्टों ने स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज- II बिल्डिंग में जेएनयू की दीवारों पर अपशब्द लिखे हैं। उन्होंने उन्हें डराने के लिए स्वतंत्र सोच वाले प्रोफेसरों के कक्षों को विरूपित किया है।"

जेएनयू कैंपस में जातिसूचक नारे

दिल्ली का जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) एक बार फिर विवादों में है। विश्वविद्यालय परिसर में स्थित कई इमारतों की दीवारों पर विवादास्पद नारे लिखे गए। इसके साथ ही कुछ प्रोफेसरों के चैंबरों के गेट पर विश्वविद्यालय के बजाए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) में जाने के लिए कहा गया है। इसका फोटो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है।

छात्रों ने दावा किया कि विश्वविद्यालय परिसर के स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज- II भवन की दीवारों पर ब्राह्मण और वैश्य समुदायों के खिलाफ नारे लिखे गए हैं। एक जगह लिखा है ‘ब्राह्मण-बनिया, हम आ रहे हैं बदला लेने’। एक जगह लिखा है ‘ब्राह्मण परिसर छोड़ो, ब्राह्मण भारत छोड़ो’। वहीं, एक जगह ‘अब खून बहेगा’ लिखा हुआ है।

वहीं, तीन प्रोफसरों के चैंबर के गेट पर ‘शाखा में जाओ’ लिखा गया है। इसको लेकर विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है। वहीं, संघ से जुड़े छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) ने इसे वामपंथियों की बर्बरता बताया है।

JNU एबीवीपी के अध्यक्ष रोहित कुमार ने कहा, “एबीवीपी कम्युनिस्ट गुंडों द्वारा अकादमिक स्थानों में बड़े पैमाने पर जातिसूचक नारे लिखने की निंदा करता है। कम्युनिस्टों ने स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज- II बिल्डिंग में जेएनयू की दीवारों पर अपशब्द लिखे हैं। उन्होंने उन्हें डराने के लिए स्वतंत्र सोच वाले प्रोफेसरों के कक्षों को विरूपित किया है।”

रोहित कुमार ने कहा, “हमारा मानना है कि अकादमिक जगहों का इस्तेमाल बहस और चर्चा के लिए होना चाहिए, न कि समाज और छात्रों के समुदाय में जहर घोलने के लिए। यहाँ नफरत और गाली के लिए कोई स्थान नहीं है।”

रोहित कुमार ने कहा कि जिस महिला प्रोफेसर के गेट पर ‘गो बैक टू शाखा’ लिखा हुआ है, उन्हें साल 2019 में 3 दिनों तक बंधक बनाकर रखा गया था। उन्होंने कहा कि आज जेएयू को हेट फैक्ट्री बना दिया गया है।

Thursday, December 1, 2022

बिलावल भुट्टो ने खोली बाजवा की पोल- पाकिस्‍तानी सेना की नाकामी से बना बांग्‍लादेश, भारत की कैद में थे 90 हजार सैनिक


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पाकिस्तान के विदेश मंत्री बिलावल भुट्टो जरदारी ने कहा है कि 1971 में पूर्वी पाकिस्तान को लेकर हुई लड़ाई में भारतीय सेना से मिली शर्मनाक हार पाकिस्तानी सेना की ''बड़ी विफलता'' थी। उन्होंने यह टिप्पणी पाकिस्तानी सेना के पूर्व प्रमुख जनरल कमर जावेद...

इंटरनेशनल डेस्क: पाकिस्तान के विदेश मंत्री बिलावल भुट्टो जरदारी ने कहा है कि 1971 में पूर्वी पाकिस्तान को लेकर हुई लड़ाई में भारतीय सेना से मिली शर्मनाक हार पाकिस्तानी सेना की ''बड़ी विफलता'' थी। उन्होंने यह टिप्पणी पाकिस्तानी सेना के पूर्व प्रमुख जनरल कमर जावेद बाजवा पर निशाना साधते हुए की जिन्होंने भारत से मिली हार को पाकिस्तान की ‘‘राजनीतिक विफलता'' करार दिया था। बिलावल ने यह टिप्पणी अपनी पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) के 55वें स्थापना दिवस के उपलक्ष्य में निश्तार पार्क में आयोजित एक रैली में की। पीपीपी के अध्यक्ष ने इस अवसर पर अपनी पार्टी के इतिहास की चर्चा की और इसके संस्थापक एवं अपने नाना जुल्फिकार अली भुट्टो की ‘‘उपलब्धियों'' को याद किया। 

डॉन अखबार ने उनके हवाले से कहा, ‘‘जब जुल्फिकार अली भुट्टो ने सत्ता संभाली, उस समय लोगों की उम्मीदें टूटी हुई थीं और वे हर तरह से निराश थे।'' बिलावल ने कहा, ‘‘लेकिन उन्होंने (जुल्फिकार) राष्ट्र का पुनर्निर्माण किया और अंतत: हमारे 90,000 सैनिकों को वापस लेकर आए जिन्हें 'सैन्य विफलता' के कारण युद्धबंदी (भारत द्वारा) बना लिया गया था। उन 90,000 सैनिकों को उनके परिवारों से मिलाया गया। और यह सब उम्मीद की... एकता की... और समावेश की राजनीति के कारण संभव हुआ।'' बाजवा ने 29 नवंबर को अपनी सेवानिवृत्ति से पहले कहा था कि पूर्वी पाकिस्तान को लेकर भारत से हुई लड़ाई में इस्लामाबाद को मिली हार "राजनीतिक विफलता" थी और पाकिस्तानी सैनिकों के बलिदान को कभी ठीक से मान्यता नहीं दी गई। 

उन्होंने कहा था कि 1971 के युद्ध में आत्मसमर्पण करने वाले सैनिकों की संख्या 92,000 नहीं थी और केवल 34,000 लड़ाके थे, जबकि अन्य लोग विभिन्न सरकारी विभागों से थे। पिछले सप्ताह रावलपिंडी में सेना मुख्यालय में आयोजित एक कार्यक्रम में बाजवा ने कहा था, “मैं रिकॉर्ड को सही करना चाहता हूं। सबसे पहले, पूर्वी पाकिस्तान का पतन सैन्य विफलता नहीं, बल्कि एक राजनीतिक विफलता थी। लड़ने वाले सैनिकों की संख्या 92,000 नहीं थी, बल्कि केवल 34,000 थी, बाकी लोग विभिन्न सरकारी विभागों से थे।'' जनरल बाजवा (61) गत 29 नवंबर को सेवानिवृत्त हो गए।

पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान द्वारा 2019 में उन्हें तीन साल का सेवा विस्तार दिया गया था। वर्तमान में खान पाकिस्तानी सेना के सबसे बड़े आलोचक हैं। भारत ने 1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम में पाकिस्तान को बुरी तरह हराकर इसके 90,000 से अधिक सैनिकों को बंदी बना लिया था और इस लड़ाई के बाद दुनिया के नक्शे पर बांग्लादेश के रूप में एक नया देश अस्तित्व में आया था। 

LAC के करीब भारत-अमेरिका के युद्धअभ्यास से चिढ़ा चीन, कहा- चीन-भारत समझौते की भावना हुई आहत


LAC से लगभग 100 किमी दूर उत्तराखंड में भारत और अमेरिका के सैनिक संयुक्त युद्ध अभ्यास कर रहे हैं। चीन ने इसका विरोध किया है और कहा है कि यह भारत और चीन के बीच हुए समझौते का उल्लंघन है।
 

India US military drills near LAC violate the spirit of Sino India agreements China vva

बीजिंग। एलएसी (Line of Actual Control) के करीब भारत और अमेरिका के सैनिक युद्धअभ्यास कर रहे हैं। इससे चीन चिढ़ा हुआ है। चीन ने भारत और अमेरिका के सैन्य अभ्यास का विरोध करते हुए कहा है कि यह भारत और चीन के बीच हुए समझौते की भावना का उल्लंघन है। दरअसल LAC से लगभग 100 किमी दूर उत्तराखंड में भारत और अमेरिका का संयुक्त युद्ध अभ्यास का 18वां संस्करण चल रहा है। इसका उद्देश्य शांति स्थापना और आपदा राहत कार्यों में दोनों सेनाओं की क्षमता बढ़ाना और विशेषज्ञता शेयर करना है। 

समझौतों की भावना का उल्लंघन है अभ्यास
चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता झाओ लिजियान ने कहा कि एलएसी के पास भारत और अमेरिका द्वारा आयोजित संयुक्त सैन्य अभ्यास ने 1993 और 1996 में चीन और भारत के हुए हुए समझौतों की भावना का उल्लंघन किया है। इससे द्विपक्षीय विश्वास बनाने में मदद नहीं मिलेगी। चीन ने सैन्य अभ्यास को लेकर भारतीय पक्ष से चिंता व्यक्त की है।

चालबाजी करता है चीन
गौरतलब है कि चीन भारत के साथ सीमा के मामले में चालबाजी की नीति अपनाता है। भारत और अमेरिका ने युद्धअभ्यास किया तो चीन को 1993 और 1996 के समझौतों की याद आ गई। मई 2020 में चीन ने समझौतों को दरकिनार करते हुए पूर्वी लद्दाख में बड़ी संख्या में सैनिकों का जमावड़ा किया था। उस समय भारत ने कहा था कि चीन द्विपक्षीय समझौतों का उल्लंघन कर रहा है। द्विपक्षीय समझौतों में सीमा से जुड़े विवाद के हल के लिए शांतिपूर्ण और मैत्रीपूर्ण परामर्श की बात की गई है।

भारत और अमेरिका की सेना हर साल मिलकर सैन्य अभ्यास करती है। पिछला अभ्यास भारत और अमेरिका की सेना ने अक्टूबर 2021 में अलास्का के एल्मडॉर्फ रिचर्डसन बेस पर किया था। उत्तराखंड में हो रहे सैन्य अभ्यास में अमेरिकी सेना के 11वीं एयरबोर्न डिवीजन की दूसरी ब्रिगेड के जवान और भारतीय सेना के असम रेजीमेंट के जवान हिस्सा ले रहे हैं। 


परम तत्व दर्शन